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“क्या अंबेडकर जी को जातियों की सीमा में बांधकर सिर्फ दलितों का नेता कहना सही है?”
                           भारत ने कई महत्वपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक विचारकों एवं दार्शनिकों को अपने इतिहास में जन्म दिया है। इन राजनीतिक विचारकों और दार्शनिकों में निःसंशय ही डॉ. भीमराव अंबेडकर का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। भारतीय समाज में इनके अनुदान को भुलाया नहीं जा सकता है। डॉ. अंबेडकर बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे जिन्होंने आधुनिक भारत को रचने में कभी ना भुलाए जाने वाला योगदान दिया है।
बाबा साहेब काफी प्रभावी राजनीतिक चिंतक थे जिनके सामाजिक और राजनीतिक विचार विभिन्न विषयों जैसे जाति प्रथा, अछूत प्रथा और राजनीतिक हस्तक्षेप से दबे लोगों को समाज में समान रूप का दर्जा दिलाना उन्हें सबसे ऊपर करता है। तमाम अनगिनत बलिदानों के बाद कहा जा सकता है कि हम आज़ाद हैं लेकिन देश के हर नागरिक को उसका हक मिलने की लड़ाई आज भी जारी है। बाबा साहेब अंबेडकर स्वतंत्र भारत के कानून एवं सामाजिक न्याय मंत्री थे।
देश में सबको समान अधिकार मिले, भारतीय समाज में सबको बराबरी मिले, यह सपना पहली बार डॉ. भीमराव अंबेडकर ने ही देखा था।
                 पंडित जवाहरलाल नेहरू ने एक बार उनके बारे में कहा था, “डॉ. अंबेडकर को भारतीय हिन्दू समाज के तमाम अत्याचारी स्वरूपों के खिलाफ एक विद्रोह के प्रतीक रूप में याद किया जाएगा।” उन अत्याचारी स्वरूपों के खिलाफ जो आवाज़ उन्होंने बुलंद की है, उसने लोगों को झकझोर कर जागृत कर दिया है। यद्यपि उन्हें एक विवादास्पद व्यक्ति के तौर पर जाना जाता हो लेकिन वास्तविकता यही है कि उन्होंने देश के शासन-प्रशासन के उन मुद्दों पर बगावत की है जिन मुद्दों पर हर किसी को बगावत करनी चाहिए थी।
डॉ. भीमराव राव अंबेडकर वर्तमान भारत के शिल्पियों में से एक थे। उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता कहा जाता है। वो भारतीय सामाजिक आंदोलन के बड़े नेता थे। डॉ. भीमराव अंबेडकर को अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय ने विश्व के सर्वोच्च 100 महान विद्वानों की सूची में स्थान दिया है। उन्हें भारतीय सर्वेक्षण में महान व्यक्तियों की सूची में भी सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। वो विश्वस्तर के विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, मानव विज्ञानी, वकील, समाज सुधारक और दलित एवं शोषित वर्ग के मानवाधिकारों के लिए संघर्ष के प्रमुख नेता थे।
आज उन्हें केवल दलितों का नेता कहकर उनकी महत्ता को कम कर दिया गया है। उन्हें जातियों की सीमा में बांधना और दलित नेता कहना उनके व्यक्तित्व को कम कर आंकने जैसा है। जबकि बाबा साहब की कोशिश इन सब से ऊपर उठकर भारत के हर वर्ग को बराबरी और सम्मान का अधिकार दिलाने की थी। वो केवल दलितों के नेता नहीं थे बल्कि हर उस घटना के धुर विरोधी थे जो अमानवीय हो।
वो इस बात से वाकिफ थे कि देश की तरक्की के लिए देश के हर वर्ग को समानता का अधिकार मिलना बहुत ज़रूरी है। यह बात शत-प्रतिशत सच है कि उन्होंने दलित वर्गों पर ज़्यादा ध्यान दिया क्योंकि वो उस समय सबसे ज़्यादा दबे-कुचले और शोषित थे। जब पूरा देश अंग्रेज़ों से लड़ रहा था तब वो सम्मान एवं बराबरी के जीवन के लिए संघर्ष कर रहे थे।
वो यह मानते थे कि अंग्रेज़ तो हमें आज़ादी दे देंगे लेकिन हम आंतरिक गुलामी का क्या करेंगे? बाबा साहब को इस बात का एहसास बहुत पहले ही हो गया था कि भारत दो प्रकार की गुलामी से जकड़ा हुआ है। एक गुलामी थी अंग्रेज़ों की दमनकारी नीतियों से और दूसरी गुलामी जाति-वर्ण व्यवस्था से तिरस्कार की गुलामी।
अंग्रेज़ों की गुलामी से तो पूरा देश लड़ रहा था लेकिन इस आंतरिक जाति-वर्ण व्यवस्था से लड़ने के लिए और दलित व शोषित वर्गों के अधिकारों के लिए अकेले भीमराव अंबेडकर संघर्ष कर रहे थे। डॉ. भीमराव अंबेडकर का जन्म एक गरीब अछूत परिवार में हुआ था जिसके कारण उनका सारा जीवन संघर्षों में बीता। उन्होंने अपना सारा जीवन दलितों को उनके अधिकार दिलाने और हिन्दू धर्म की चतुवर्ण प्रणाली एवं भारतीय समाज व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में बिता दिया।
हिन्दू धर्म में समाज को चार वर्णों में विभाजित किया गया है जिसमें शूद्रों को सबसे निचला दर्जा दिया गया है। उन्हें मानवीय अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया है। डॉ. भीमराव अंबेडकर इसी वर्ण में पैदा हुए थे और इस वजह से उन्होंने सारी विपदाएं झेली थी। उनके अनुसार शिक्षा ही हर प्रकार की समस्याओं का समाधान है। उनका यह नारा “शिक्षित बनो, संगठित बनो, संघर्ष करो” काफी प्रासंगिक है।
साभार-यूथ की आवाज
*मनोनीत दीप*